मराठी भाषा में रहस्य उपन्यासों को बड़ी लंबी परंपरा है. साहित्य के इतिहास में मराठी उपन्यासकारों ने कई बेहतरीन रचनाएं प्रस्तुत की है. इन्हीं उपन्यास श्रृंखलाओं में हम 'वसंत वसंत लिमये'जी की "विश्वस्त" को शामिल कर सकते हैं. 'कृष्ण की द्वारका के खजाने का रहस्य' इस संकल्पना को केंद्र स्थान मानकर लिखा हुआ यह उपन्यास है. इसकी शुरुआत होती है, महाभारत काल से. फिर इसे बड़ी खूबी से चंद्रगुप्त काल, गजनवी का कालखंड, भारतीय स्वतंत्र पूर्वकाल खंड और आज के कालखंड से जोड़ा गया है. अधिकतम कथा आज के कालखंड से जुड़ी हुई है. जिसमें पांच मित्र आधुनिक काल में इतिहास की खोज में लगे हैं. इसमें से एक विदेशी युवती भी है. शिवाजी महाराज का किला विजयदुर्ग, मुंबई की सुरंगे, तथा नाशिक के भंडार दुर्ग किले से होकर यह कहानी गुजरात का मोड़ लेती है. सभी घटनाएं तथा पात्र बहुत बारीकियों से लिमयेजीने प्रस्तुत किए हैं. जिस वजह से यह उपन्यास शुरुआत से ही आखिर तक वाचको को कहानी में जुड़ा हुआ रखती है. इसी कारणवश इस उपन्यास को मराठी भाषा में लिखित अप्रतिम कलाकृति में शामिल किया जा सकता है.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि॥ [A Blog by Tushar Kute]
Wednesday, October 23, 2019
Monday, October 14, 2019
इंटरनॅशनल पाठशालाओं का युग
महाराष्ट्र में ही बल्कि पूरे देश में पिछले पांच सालों में अंग्रेज़ी माध्यमों के विद्यालय (पाठशाला) की तादाद बड़े पैमाने पर बढ़ गई है। आजकल गली-गली में अंग्रेज़ी स्कूल नज़र आते हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में “सीबीएसई” के ’इंटरनैशनल स्कूल’ खुले हैं। ग्रामीण जनता भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाने में बड़ी ही उत्सुक है। जिस गती से अंग्रेज़ी स्कूल बढ़ रहे है, उस गती से क्या अध्यापकों की संख्या बढ़ रही है? इसका विचार भी होना ज़रूरी है।
अंग्रेज़ी माध्यम से ’शिक्षक’ की डिग्री पानेवालों की तादाद अपने राज्य में बहुत ही कम है, इसलिये सभी अंग्रेज़ी स्कूलों को अच्छे अध्यापक नहीं मिल रहे। इस के परिणाम अब हमारे सामने उभरकर आ रहे हैं। आज अंग्रेज़ी स्कूलों के कई अध्यापक हिंदी में सिखातें है। तथा छात्रों से अंग्रेजी से कभी भी वार्तालाभ नहीं करते। इसी कारणवश आज ऐसे स्कूलों से पास हुए बच्चे अंग्रेज़ी नहीं बोल पा रहे हैं। मैने ख़ुद देखा है की, अंग्रेज़ी माध्यम से अपनी तालीम पूरा करनेवाले बच्चे अंग्रेज़ी के बजाए हिंदी के बात करना पसंद करते है, क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ी की अच्छी तालीम ही नहीं हासिल हुई। उनके अध्यापक उनसे पूरी तरह हिंदी में चर्चा करते है। और छात्रों को अंग्रेज़ी भी बोलनी नहीं आती। जब अध्यापक को ही अंग्रेज़ी नहीं आती तो वे छात्रों को क्या सीख देंगे? मैंने और एक बात भी गौर की है की, दो मराठी भाषिक तथा दो गुजराती भाषिक भी एक दूसरे से हिंदी में बात करते है, जब की उन की पढ़ाई अंग्रेज़ी में हुई है और मातृभाषा अलग है।
शिक्षा का माध्यम किस लिए चुना जाता है? इस का जवान छात्र के माता-पिता को मालूम होना चाहिए। अगर मालूम है; तो ये भी जान लेना चाहिये की, अपना बेटा/बेटी अंग्रेज़ी से ही पढ़ रहे हैं। शिक्षणविज्ञान कहता है की, अपनी मातृभाषासे पढ़ो, वही आपकी सबसे अच्छी तालीम होगी। यहां अंग्रेज़ी माध्यम से न ही अंग्रेज़ी का ज्ञान आ रहा है और न ही मातृभाषा का! ऐसी पढ़ाई का क्या फ़ायदा? हमें सिर्फ़ रट्टू पोपट तैयार नहीं करने। इस देश के भविष्य को बदलने की ताकत रखनेवाली युवा पिढी तैयार करनी है।
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Location:
Pune, Maharashtra, India
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