Saturday, December 1, 2012

छत्रपति (शीर्षक गीत)



सन २००५ में तेलुगू में ’छत्रपति’ नामक फ़िल्म रीलीज़ हुई थी। राजामौली निर्देशित इस फ़िल्म में प्रभास, भानुप्रिया तथा श्रिया सरन की मुख्य भुमिकाएं थी। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत और थीम संगीत बहुत ही सुमधुर है। फ़िल्म की रीलीज़ के बाद वह काफ़ी मशहूर हुआ था। ये संस्कृत गीत यहां शब्दों में लिखकर दे रहा हूं। इस लिंकपर यह गीत सुना जा सकता है।


अग्नी स्खलन संत्रधरिपु वर्ग प्रलय रथ छत्रपति..
मध्यमधिन सम्युध्यात किरण विद्यधुमति खनि छत्रपति..
तज्जेम तज्जेनु तधिम धिरन..
धिम धिम तटिक नट छत्रपति..
ऊर्वी प्रलय संभाव्यवर स्वच्छंद गुणधि.....

कुंभी निकर कुंभस्य गुरू कुंभि वलय पति छत्रपति..
झंझा पवन गर्वापहर विंद्याद्रीसम द्रुति छत्रपति..
चंडा प्रबल दोर्दंडजित दुर्दंड भट तति छत्रपति..
शत्रू प्रकर विच्छेदकर भीमार्जुन प्रति..... ॥ २ ॥

धिग धिग विजय डंका निनद घंटारव तुष्ठित छत्रपति..
संघ स्वजन विद्रोही गण विध्वंसव्रत मति छत्रपति..
आर्थात्राण दुष्टद्युम्न क्षात्र स्फुर्ति दिधति..
भीमक्षामपति, शिक्षा, स्मृति स्थापति.....

फ़िल्म: छत्रपति (तेलुगू, मल्याळम-डब), हुकुमत की जंग (हिंदी-डब)
संगीत: किरावनी
समूह गायक: किरावनी, मंजिरी, मतांगी.

इस गीत के गीतकार कौन है? इस की जानकारी मुझे नहीं मिली। अगर किसी को इस के बारे में जानकारी है तो कृपया कमेंट करें।

Saturday, September 1, 2012

काकस्पर्श: अब बॉलिवूड में



महेश मांजरेकर एक बहुत ही संवेदनशील निर्देशक है, ऐसा मुझे उनकी फ़िल्म ’काकस्पर्श देखकर लगा. सन २०१२ में प्रदर्शित हुई ’काकस्पर्श’ महेश मांजरेजर की सर्वोत्तम फ़िल्म मैं मानता हूं. मैंने उनकी सभी मराठी फ़िल्में देखी हैं, लेकिन इस फ़िल्म का अंदाज़ ही कुछ अलग नज़र आया. ’काकस्पर्श’ जैसी फ़िल्म बनाने में महेशजी ने कितना अभ्यास किया होगा, यह फ़िल्म देखने पर ही पता चलता है.

’काकस्पर्श’ मतलब ’कौए का स्पर्श’. मनुष्य के मृत्युपश्चात करने का यह एक विधी है. हिंदू परंपराओं के अनुसार वह किया जाता है. जब तक ’काकस्पर्श’ नहीं होता तब तक मनुष्य के आत्मा को शांती नहीं मिलती. इसी कहानी को निर्देशक ने परदे पर फ़िल्म में दिखाया है. मूलत: कहानी एक विधवा के जीवन पर आधारित है. जिस का रोल केतकी माटेगांवकर तथा प्रिया बापट ने किया है. दोनों अभिनेत्रियों के जीवन का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ रोल रहा होगा. फ़िल्म में असली जान हरिदादा की भूमिका करनेवाले सचिन खेडेकर ने लाई है. मैं इस फ़िल्म की कहानी यहां बयां तो नहीं करूंगा, तथा समीक्षा का भी मेरा कोई इरादा नहीं है. अगर ’काकस्पर्श’ देखनी है और आप संवेदनशील फ़िल्मों में रूची रखते है तो यह फ़िल्म ज़रूर देखिये. मुझ से अच्छी समीक्षा सतिश पंचम ने अपने ब्लॉग ’सफ़ेद घर’ में की है. इसे ज़रूर पढ़िये.
सुनने में आया है की, अब यह फ़िल्म बॉलिवूड में बनने वाली है. और इस में मुख्य भुमिका महानायक अमिताभ बच्चन निभाने वाले है. अन्य भारतीय भाषाओं की फ़िल्में अब बॉलिवूड वाले फिरसे बनाने लगी है. इस चोरी को वह ’रीमेक’ कहा करते है. इसी बलबूते पर अब बॉलिवूड चलने लगा है. फ़िल्म के रीमेक की पुष्टी तो हुई है, लेकिन मुख्य भुमिका की अब तक नहीं हुई. सचिन खेडेकर जैसे सशक्त अभिनेता का रोल करने वाला कोई वैसाही अभिनेता होना चाहिये.
फ़िल्म बॉलिवूड में बनेगी तो शायद इसे कम प्रतिसाद मिले. क्युंकि आजकल बॉलिवूड में सिर्फ़ मसालेदार फ़िल्में ही चलती है. अन्य फ़िल्में तो सिर्फ़ एवार्ड्स के लिये ही बनायी जाती है, ऐसा कहा जाता है. उम्मीद करते है की, उषा दातार की उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म बॉलिवूड में बने और अधिकतम लोग इसे देखें.
शुभकामनायें...

Saturday, August 25, 2012

“भारतीय”: मतलब क्या रे भाई?


’देऊळ’ के गौरवशाली यश के बाद निर्माता अभिजित घोलप की फ़िल्म ’भारतीय’ फिर से एक नया संदेश लेकर आयी है. अजय-अतुल ने करीब तीन साल बाद किसी मराठी फ़िल्म को संगीतबद्ध किया है. ’भारतीय म्हंजी काय रं भाऊ’ इस सवाल का जवाब ढुंढने का प्रयास करनेवाली यह फ़िल्म ११ अगस्त तो महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में रीलीज़ हुई.
फ़िल्म की कहानी महाराष्ट्र-कर्नाटक के सीमा पर बसे ’आडनीड’ गांव से शुरू होती है. महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा प्रश्न के बारे में सभी भारतीय जानते ही है. संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन के बाद भी कई मराठीभाषी गांव महाराष्ट्र में शामील नहीं हुए थे. इसी धागे को लेकर कहानी आगे बढती है. ’आडनीड’ एक बहुत ही पिछड़ा हुआ गांव है. जहां के लोगों को सिर्फ़ अपने रोज़ की रोज़ीरोटी कमाने की ही फ़िक्र रहती है. बाकी मामलों में वे कुछ दखलअंदाज़ी नहीं करते. गांव की राजनीती संभालनेवाले लाडे पाटिल (कुलदीप पवार) और सरदेशमुख (मोहन आगाशे) आपस के दुश्मन है. एक दिन गांव में एक लड़का (सुबोध भावे) अपने पूर्वजों के मूल ढुंढते हुए पहुंचता है. लेकिन एक दिन उसे पता चलता है की, यह गांव न ही महाराष्ट्र में आता अहि और न ही कर्नाटक में! ऐसे पिछड़े गांव से हमे कुछ भी नहीं मिल सकता यह देखकर दोनों राज्यों के राजनेता इसे अपना नहीं मानते. फिर नायक का संघर्ष शुरू होता है. अगर यह गांव दोनों राज्यो में नहीं है, तो कहा है? फिर एक दिन नायक को सरदेशमुख की हवेली से ऐसे कागज़ाद मिलते है, जिसे पता चलता है की यह गांव एक स्वतंत्र संस्थान घोषित किया गया था मगर इस बात का ज़िक्र अब तक नहीं हुआ. इसी हवेली में बहुत सारा गुप्तधन भी नायक को हासिल होता है. इस के बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक इस गांव को अपना मानने में संघर्ष शुरू करते है. लेकिन नायक के मन में कुछ और ही विचार है. अपने गांव को वो एक राष्ट्र घोषित करता है जिसे स्वतंत्र भारत में विलीन ही नहीं किया गया था. इस के बाद का संघर्ष परदे पर देखना ही उचित होगा. इस गांव को ’भारतीय’ साबित करने की कोशिश ’भारतीय’ में दिखाई गयी है.

फ़िल्म मे मुख्य सूत्रधार है, मकरंद अनासपुरे. उन्हें पहली बार कुछ अलग भूमिका मे देखा जा सकता है. मुख्य नायक सुबोध भावे को रास्ता दिखाने का काम वे कई बार करते है. मीता सावरकर बहुत की कम फ़िल्मों में मुख्य नायिका के रूप में देखी गई है. ’पांगिरा’ के बाद शायद यह उसकी दूसरी फ़िल्म होगी. जितेंद्र जोशी का रोल एक ’कन्फ्युज़्ड केरेक्टर’ का है. ’भारतीय म्हंजी काय रं भाऊ’ यह सवाल भी उन के ही मन में पहली बार आता है. वह गांव के लाडे पाटिल के पुत्र के रूप मे नज़र आता है.
नटरंग के बाद अजय-अतुल ने ’भारतीय’ मराठी को संगीत दिया. वह श्रवणीय है. श्रेया घोषाल, रूपकुमार राठोड तथा कुणाल गांजावाला जैसे गायको ने ’भारतीय’ के गीतों को गाया है. श्रेया का ’अय्यय्यो’ गीत ने कई दिनों से धूम मचाई हुई है. रूपकुमार राठोड का कृष्ण भजन तथा कुणाल गांजावाला का ’आम्ही लई सॉलिड आहोत’ एक बार ज़रूर सुनिये. अनिरूद्ध पोतदार की यह कहानी कई बार सच घटना पर आधारित है, ऐसा ही लगता है. शायद हो भी सकती है.
२०१२ के टॉप पांच फ़िल्मों में अभी ही इस फ़िल्म ने अपना नाम दर्ज किया है.
मेरी रेटिंग: ३.५ स्टार.

Monday, August 13, 2012

’भारतीय’ बनाम ’एक था टायगर’



सलमान खान अभिनित बहुचर्चित फ़िल्म ’एक था टायगर’ इस १५ अगस्त को रीलीज़ होने वाली है. सलमान ख़ान की फ़िल्म कैसी भी हो, वो चलती है. ’बॉडीगार्ड’ तथा ’रेडी’ जैसी फ़िल्मों ने इस देश में रीकार्डतोड व्यवसाय किया था. ’एक था टायगर’ फ़िल्म को अधिकतम सिनेमाघर नहीं मिल रहें थें, इसलिये अब मराठी फ़िल्मों को महाराष्ट्र के सिनेमाघरों से निकालने की साजिश रची जा रही हैं.
हालही में रीलीज़ हुई मराठी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’भारतीय’ महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में हाऊसफुल चल रही है. इस फ़िल्म के करीब ४५० शोज़ महाराष्ट्र में दिखायें जा रहें हैं. लेकिन, सलमान की फ़िल्म पहले हफ़्तें अपने नये रीकार्ड बनाये, इसलिये ’भारतीय’ जैसी बेहतरीन फ़िल्म को महाराष्ट्र के सिनेमाचालक चार दिनों में ही बाहर का रास्ता दिखाने वाले हैं. पिछले कई सालों से इस राज्य में बॉलिवूडी फ़िल्में अपनी दादागिरी दिखती आई हैं. इसी का परिणाम स्वरूप आज ये दिन देखने को मिला है. बॉलिवूडी फ़िल्में यहां के मराठी लोगों को काफ़ी पसंद है. मराठी फ़िल्म कैसी भी हो वे देखने को नहीं जाते. बॉलिवूड का ग्लैमर उन्हें बहुत लुभाता है. इसलिये बॉलिवूड कलाकार मराठियों को अपना पहला दर्शक मानते है. इसी कारणवश मराठी फ़िल्मों को बॉलिवूड तथा मूर्ख मराठी दर्शक दुय्यम दर्ज़े का मानते है. मराठी फ़िल्में महाराष्ट्र मे टैक्स फ़्री होती हैं. इस के प्रदर्शन पर सरकार को कोई टैक्स नहीं मिलता. इसलिये, मराठी फ़िल्में चले या ना चले महाराष्ट्र सरकार को कुछ भी फ़ायदा नहीं होता. लेकिन, बॉलिवूड के लिये ऐसा नहीं है. इन फ़िल्मों से सरकार को अच्छा पैसा मिलता हैं. ’एक था टायगर’ के लिये टिकिट्स के रेट भी बढ़ा दिये है. पहले हफ़्तें फ़िल्म सभी अन्य फ़िल्मों का रीकार्ड तोड़ दे, इसलिये फ़िल्म के निर्माताओं ने यह चाल रची. सलमान ने इस पर नाराज़गी दिखाई लेकिन वे इस से बहुत खुश होंगे क्युंकी उनकी ’आमदनी’ बढने वाली है!
एक बॉलिवूड फ़िल्म के लिये बेहतरीन दर्ज़े की मराठी फ़िल्म के शोज़ बंद करवाना मराठी लोगों के लिये शर्म की बात है. ’भारतीय’ नाम से पता चलता है की, यह फ़िल्म किस तरह की है. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ’देऊळ’ के निर्माताओं ने यह फ़िल्म बनाई है. जितेंद्र ज़ोशी तथा सुबोध भावे जैसे मराठी अभिनेता इस फ़िल्म में मुख्य भुमिका में है. और आज़कल के बॉलिवूड में गये संगीतकार अजय-अतुल का संगीत इस फ़िल्म को मिला है. ऐसी फ़िल्म को अपने फ़ायदें के लिये बली चढ़ाने की साजिश सिनेमाचालक महाराष्ट्र में रची जा रही हैं. हमारे मराठी दर्शक तो इस बात से बहुत खुश होंगे की, अब उन की ’एक था टायगर’ देखने की इच्छापूर्ती होंगी. मुझे यकीन है की, ऐसी वारदात अगर कर्नाटक में या तमिलनाडू में हुई होती तो ज़रूर वहां के दर्शकों ने सिनिमाघरों को जला दिया होता! दक्षिण में लोग उन के ज़ुबान की ही फ़िल्म देखते है. लेकिन मराठी लोग बहुत ज़्यादा ही नेक दिल है. मराठी लोगों को शर्म आनी चाहिये जब  वो १५ अगस्त को ’भारतीय’ छोडकर बॉलिवूडी फ़िल्में देखें.

बॉलिवूड की अश्लिल फ़िल्मों के बादशाह की एक फ़िल्म महाराष्ट्र के सिनेमाघरों मे जोरशोर से चल रही है. जिस फ़िल्म को विदेश में बहुत बूरी तरह से पिटना पड़ा वह ’ए’ ग्रेड फ़िल्म यहा हाऊसफुल चल रही थी. इस फ़िल्म के नाशिक के सिनेमैक्स में आज भी रोज़ १० शो दिखायें जा रहे हैं. नाशिक जैसे छोटे शहर में भी यह अश्लिल फ़िल्म हिट चल रही है. ’एक था टायगर’ के लिये इस फ़िल्म को सिनेमाघर से बाहर हमारे सिनेमाचालक नहीं निकालना चाहते. क्युंकी, ऐसा करने पर इस फ़िल्म के महान निर्माता नाराज़ हो जायेंगे. ’भारतीय’ को बाहर निकालने पर ऐसा नहीं होगा, यह यकीन सलमान को है.
’भारतीय’ के लिये महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना तथा शिवसेना पहली बार किसी आंदोलन में एकसाथ नज़र आयी. यह महाराष्ट्र लिये एक शुभसंकेत है. मराठी के लिये वे हमेशा ही साथ-साथ लढ़ते रहेंगे, ऐसी आशा करता हूं.
कल मराठी न्युज़ चैनल ’एबीपी माझा’ पर सिनेमैक्स के एक पीआरओ ’भारतीय’ को अपने सिनेमाघर से बाहर निकालने की साजिश का बड़ी बेशरमी से समर्थन कर रहे थे. ऐसे लोगों से ही मराठी फ़िल्मों को बड़ा ख़तरा है. अब सिर्फ़ मराठी दर्शक ही दिखा सकते है, की मराठी फ़िल्में चलेगी या बॉलिवूडी राज कायम रहेगा...

Wednesday, August 8, 2012

तुकाराम (फिल्म): जगद्गुरूका सफ़र


महाराष्ट्र को संतों की भूमी कहा जाता है। संत तत्वज्ञान तथा मराठी साहित्य ने मराठी मनुष्य को सभ्यता की सीख दी है। मराठी संतपरंपरा के प्रथम कवी संत ज्ञानेश्वर को तथा आखरी कवी संत तुकाराम को माना जाता है। प्रसिद्ध मराठी काव्यपंक्ति ’ज्ञानदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस...’ में यही बात दर्शायी है। संत तुकाराम का जन्म पुणे के नज़दीक देहू गांव में हुआ था। महाराष्ट्र वारकरी संप्रदाय उन्हें जगद्गुरू कहता है। सभी मराठी जन उन्हें जगद्गुरू संत तुकाराम के नाम से ही पहचानती हैं।
महाराष्ट्र के वारकरी जब पंढरपूर की यात्रा पर चलते है, तो ’ज्ञानोबा माऊली तुकाराम’ का ही जयघोष करते है। यह स्थान संत तुकाराम का मराठी दिलों में है। उन के संतजीवन पर आधारीत पहली फिल्म विष्णुपंत पागनीस ने १९४० के दशक में बनायी थी। उसका नाम था- ’संत तुकाराम’। एक फिल्म मराठी ही नहीं बल्कि भारतीय फिल्मजगत एक माईलस्टोन बन के रह गयी है। क्योंकि प्रतिष्ठापूर्ण कान्स फिल्म्स फेस्टीव्हल में इसे सन्माननीय सुवर्ण कमल पदक से सन्मानित किया गया था। यह पुरस्कार पानेवाली यह पहली भारतीय फिल्म थी। महाराष्ट्र में इस फ़िल्म ने सुवर्णमहोत्सव पूरा किया था। फ़िल्म का प्रभाव इतना था की, लोग फ़िल्म देखने थियेटर में अपने जूतें उतारकर जाते थें। विष्णुपंत को ही संत तुकाराम मानकर उनकी पूजा करते थे।
आज इस के सत्तर साल बाद फिरसे संत तुकाराम के जीवन चरित्र पर आधारित फ़िल्म मराठी में बनाई गयी। इस बीच सिर्फ़ एक बार ऐसा प्रयास कन्नड में हुआ था। इस फ़िल्म का नाम था- ’भक्त तुकाराम’। सन २०१२ में चंद्रकांत कुलकर्णी निर्देशित ’तुकाराम’ फ़िल्म प्रदर्शित हुई। १९४० की फ़िल्म संत तुकाराम के संतचरित्र पर आधारित थी तथा नयी फ़िल्म उनके सामान्य मनुष्य से संत के सफ़र पर आधारित है। इसिलिये किसी भी फ़िल्म समीक्षक ने दोनों फ़िल्मों की तुलना करना उचित नहीं समझा। लोगों के मन में यही शंका थी की, परदें पर इससे पहले भी ’संत तुकाराम’ आ चुकी है, अब कुलकर्णीजी क्या नया दिखाने वाले है? फ़िल्म को देखकर ऐसा महसूस होता है की, निर्देशक जिस उद्देश्य को लेकर यह फ़िल्म बना रहे थे वह उन्होनें हासिल किया है। संत तुकाराम के जन्म से लेकर संतजीवन का सफ़र इस फ़िल्म में प्रभावशाली रूप से सादर किया है।

फ़िल्म की शुरूआत ही तुकाराम के बालजीवन से होती है। उनके माता-पिता तथा भाई सावजी, कान्हा और दोनों पत्नियों का चरित्र भी इस फ़िल्म में सारांश रूप में नज़र आता है। उन के जीवन पर किन घटनाओं का असर हुआ तथा किन व्यक्तियों का प्रभाव था, यह बातें निर्देशक ने बहुत ही अच्छी तरह से परदे पर दिखाई है। फ़िल्म पूरी तीन घंटे की होने के बावजूद कही पर भी, थम नहीं जाती। इंटरर्व्हल तक की फ़िल्म तुकाराम के व्यवहारिक जीवन पर आधारित है। इस में उन के जीवन की सभी घटनायें फ़िल्माई गयी है।
यह केवल एक मनोरंजन करनेवाली फ़िल्म नहीं बल्कि जीवन की कहानी बयां करनेवाली फ़िल्म है। तुकाराम की मुख्य भुमिका निभानेवाले जितेंद्र ज़ोशी को इससे पहले मैंने कई फ़िल्मों में देखा है। वे मराठी के जानेमाने विनोदी अभिनेता तथा एक कवी भी है। लेकिन इस फ़िल्म में संत तुकाराम के रूप में वे खूब सजे है। अन्य लोगों की तरह मुझे भी यह आशंका थी की, एक विनोदी अभिनेता तुकाराम की भुमिका क्या कर पायेंगे? लेकिन, जितेंद्र ने इस भुमिका में जान लाई है, ऐसा कहा तो ग़लत नहीं होगा। संत तुकाराम पर आधारित इस दूसरी फ़िल्म को भीमाईलस्टोन बनाने में उन का योगदान सबसे अधिक होगा।     
मराठी फ़िल्मों की गुणवत्ता दिन--दिन बढती ही जा रही है।तुकारामके गीत भी फ़िल्म मे बाद याद में रहते हैं। इन में से कई तोसंत तुकाराममे भजन ही हैं। उन्हें अवधूत गुप्ते तथा अशोक पत्की ने संगीतबद्ध किया हैं। संत तुकाराम ने लिखावृक्षवल्ली आम्हा सोयरी, वनचरेबहुत की खुबी से अनिरूद्ध जोशी ने गाया है। अन्य गीतों में ज्ञानेश्वर मेश्राम, अवधूत गुप्ते तथा हरिहरन अपना कमाल दिखाते है। फ़िल्म का अल्बम एक बार ज़रूर सुनिये। ऐसे श्रवणीय गीत आजकल मराठी फ़िल्मों की खासियत बन गयी है।

आजकल कीग्रेड फ़िल्मों में तुकारामफ़िल्म को देखना अपने युवा पिढी के उसूलों के ख़िलाफ़ होगा। फिर भी अगर कोई अच्छी फ़िल्म देखना चाहते हो, तो ये फ़िल्म ज़रूर देखिये।
मेरा रेटिंग: .५ स्टार.

Tuesday, August 7, 2012

अंग्रेज़ी विद्यालयों में हिंदी

महाराष्ट्र में ही बल्कि पूरे देश में पिछले पांच सालों में अंग्रेज़ी माध्यमों के विद्यालय (पाठशाला) की तादाद बड़े पैमाने पर बढ़ गई है। आजकल गली-गली में अंग्रेज़ी स्कूल नज़र आते हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में “सीबीएसई” के ’इंटरनैशनल स्कूल’ खुले हैं। ग्रामीण जनता भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाने में बड़ी ही उत्सुक है। जिस गती से अंग्रेज़ी स्कूल बढ़ रहे है, उस गती से क्या अध्यापकों की संख्या बढ़ रही है? इसका विचार भी होना ज़रूरी है।
अंग्रेज़ी माध्यम से ’शिक्षक’ की डिग्री पानेवालों की तादाद अपने राज्य में बहुत ही कम है, इसलिये सभी अंग्रेज़ी स्कूलों को अच्छे अध्यापक नहीं मिल रहे। इस के परिणाम अब हमारे सामने उभरकर आ रहे हैं। आज अंग्रेज़ी स्कूलों के कई अध्यापक हिंदी में सिखातें है। तथा छात्रों से अंग्रेजी से कभी भी वार्तालाभ नहीं करते। इसी कारणवश आज ऐसे स्कूलों से पास हुए बच्चे अंग्रेज़ी नहीं बोल पा रहे हैं। मैने ख़ुद देखा है की, अंग्रेज़ी माध्यम से अपनी तालीम पूरा करनेवाले बच्चे अंग्रेज़ी के बजाए हिंदी के बात करना पसंद करते है, क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ी की अच्छी तालीम ही नहीं हासिल हुई। उनके अध्यापक उनसे पूरी तरह हिंदी में चर्चा करते है। और छात्रों को अंग्रेज़ी भी बोलनी नहीं आती। जब अध्यापक को ही अंग्रेज़ी नहीं आती तो वे छात्रों को क्या सीख देंगे? मैंने और एक बात भी गौर की है की, दो मराठी भाषिक तथा दो गुजराती भाषिक भी एक दूसरे से हिंदी में बात करते है, जब की उन की पढ़ाई अंग्रेज़ी में हुई है और मातृभाषा अलग है।
शिक्षा का माध्यम किस लिए चुना जाता है? इस का जवान छात्र के माता-पिता को मालूम होना चाहिए। अगर मालूम है; तो ये भी जान लेना चाहिये की, अपना बेटा/बेटी अंग्रेज़ी से ही पढ़ रहे हैं। शिक्षणविज्ञान कहता है की, अपनी मातृभाषासे पढ़ो, वही आपकी सबसे अच्छी तालीम होगी। यहां अंग्रेज़ी माध्यम से न ही अंग्रेज़ी का ज्ञान आ रहा है और न ही मातृभाषा का! ऐसी पढ़ाई का क्या फ़ायदा? हमें सिर्फ़ रट्टू पोपट तैयार नहीं करने। इस देश के भविष्य को बदलने की ताकत रखनेवाली युवा पिढी तैयार करनी है।