Saturday, September 1, 2012

काकस्पर्श: अब बॉलिवूड में



महेश मांजरेकर एक बहुत ही संवेदनशील निर्देशक है, ऐसा मुझे उनकी फ़िल्म ’काकस्पर्श देखकर लगा. सन २०१२ में प्रदर्शित हुई ’काकस्पर्श’ महेश मांजरेजर की सर्वोत्तम फ़िल्म मैं मानता हूं. मैंने उनकी सभी मराठी फ़िल्में देखी हैं, लेकिन इस फ़िल्म का अंदाज़ ही कुछ अलग नज़र आया. ’काकस्पर्श’ जैसी फ़िल्म बनाने में महेशजी ने कितना अभ्यास किया होगा, यह फ़िल्म देखने पर ही पता चलता है.

’काकस्पर्श’ मतलब ’कौए का स्पर्श’. मनुष्य के मृत्युपश्चात करने का यह एक विधी है. हिंदू परंपराओं के अनुसार वह किया जाता है. जब तक ’काकस्पर्श’ नहीं होता तब तक मनुष्य के आत्मा को शांती नहीं मिलती. इसी कहानी को निर्देशक ने परदे पर फ़िल्म में दिखाया है. मूलत: कहानी एक विधवा के जीवन पर आधारित है. जिस का रोल केतकी माटेगांवकर तथा प्रिया बापट ने किया है. दोनों अभिनेत्रियों के जीवन का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ रोल रहा होगा. फ़िल्म में असली जान हरिदादा की भूमिका करनेवाले सचिन खेडेकर ने लाई है. मैं इस फ़िल्म की कहानी यहां बयां तो नहीं करूंगा, तथा समीक्षा का भी मेरा कोई इरादा नहीं है. अगर ’काकस्पर्श’ देखनी है और आप संवेदनशील फ़िल्मों में रूची रखते है तो यह फ़िल्म ज़रूर देखिये. मुझ से अच्छी समीक्षा सतिश पंचम ने अपने ब्लॉग ’सफ़ेद घर’ में की है. इसे ज़रूर पढ़िये.
सुनने में आया है की, अब यह फ़िल्म बॉलिवूड में बनने वाली है. और इस में मुख्य भुमिका महानायक अमिताभ बच्चन निभाने वाले है. अन्य भारतीय भाषाओं की फ़िल्में अब बॉलिवूड वाले फिरसे बनाने लगी है. इस चोरी को वह ’रीमेक’ कहा करते है. इसी बलबूते पर अब बॉलिवूड चलने लगा है. फ़िल्म के रीमेक की पुष्टी तो हुई है, लेकिन मुख्य भुमिका की अब तक नहीं हुई. सचिन खेडेकर जैसे सशक्त अभिनेता का रोल करने वाला कोई वैसाही अभिनेता होना चाहिये.
फ़िल्म बॉलिवूड में बनेगी तो शायद इसे कम प्रतिसाद मिले. क्युंकि आजकल बॉलिवूड में सिर्फ़ मसालेदार फ़िल्में ही चलती है. अन्य फ़िल्में तो सिर्फ़ एवार्ड्स के लिये ही बनायी जाती है, ऐसा कहा जाता है. उम्मीद करते है की, उषा दातार की उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म बॉलिवूड में बने और अधिकतम लोग इसे देखें.
शुभकामनायें...

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