Tuesday, May 28, 2013

सातवाहन: महाराष्ट्र के निर्माता

सातवाहन... यह नाम मैने पहली बार छठी या सातवी कक्षा मे पढा होगा, लेकिन सिर्फ़ पढ़ाई के लिये ही! उसके बाद मुझे इस नाम से कोई लेनादेना नहीं पडा. लेकिन, जब महाराष्ट्र के कई किलों की सफ़र की तब ऐसा एहसास हुआ की, सातवाहन के बारे में जानकारी होनी ही चाहिये. आज भी कई मराठी तथा महाराष्ट्रीय लोगों की सातवाहन साम्राज्य के बारे में मालूम नहीं है.

Satvahan empire map (Wikipedia)

मैं नाशिक में रहता हू. यहां का एक सुप्रसिद्ध पहाड़ है- पांडव लेणी. नाशिक के अधिकतम लोग, युवक यही कहते है की, यह पांडव गुंफाये महाभारत युग की है और वे पांडवों ने बनाई है! ऐसा ही उत्तर मुझे मेरे शिवनेरी किलें की गुंफायें देखने के बाद मिला था. उनकी नाम की वजह से मैने यकीन कर लिया. जब पांडव गुफाओं के यहा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का लगा हुआ बोर्ड पढा तो ज़्यादा कुछ समझ में नहीं आया! उस बोर्ड पर पांडव गुंफाओं का इतिहास लिखा हुआ है और उसमें सातवाहन का भी उल्लेख है. ऐसे उल्लेख मुझे कई जगह पढ़ने को मिले. फिर मैने ठान ली की सातवाहनों के बारे में सबकुछ जानकारी हासिल कर के ही रहूंगा. इसी वजह से मुझे महाराष्ट्र का एक छिपा इतिहास ज्ञात हुआ. रा. श्री. मोरवंचीकर की ’सातवाहन कालीन महाराष्ट्र’ नामक मराठी किताब मैने पढ़ी. इस के अलावा इंटरनेटपर सातवाहनों के बारे में कई तरह की जानकारी प्राप्त की.


इसवी सन पूर्व पहली शताब्दी के दरमियां महाराष्ट्र में शक तथा क्षत्रप तथा क्षहरात वंशीय राजाओं की हुकुमत थी. वे मूलत: मंगोलिया के है. यह वही मंगोलिया है जिसने चंगेज़ ख़ान नामक हैवान को जन्म दिया था. शक साम्राज्य बहुत ही जुल्मी साम्राज्य था. इसे खत्म करने के लिये छिमुक छातवाहन नामक ब्राम्हण राजा ने स्वराज्य की स्थापना की. यही सातवाहन साम्राज्य है. लेकिन, शकों का साम्राज्य बहुत ही विशाल था. उसे खत्म करने के लिये सातवाहनों की बीस नस्लें चली गयी. बिसवां राजा था गौतमीपुत्र सातकर्णी. उस जमाने में सातवाहन राजा अपने माता का नाम लगाते थे. इस ढंग की मातृसत्ताक पद्धती सातवाहन चलाते थे. गौतमीपुत्र गौतमी बलश्री नामक राणी के पुत्र थे. वे राजा बने तब सातवाहन साम्राज्य बहुत ही छोटा था. वे सातारा के नज़दिक कही अपना राज्य चलाते थे. गौतमीपुत्र ने लगातार बीस साल तक शकों से संघर्ष किया. अपनी लष्करी ताकद बढायी और अंतिमत: नाशिक के गोवर्धन के नज़दिक शक राजा नहपान को पराजित कर दिया. महाराष्ट्र के इतिहास में यह सबसे बड़ा युद्ध था. इस युद्ध के बाद सातवाहन का उत्कर्ष शुरू हुआ. पुणे जिलें मे स्थित जुन्नर शहर शकों की राजधानी थी और एक बडा व्यापारी केंद्र भी था. उसपर सातवाहनों ने कब्जा कर लिया. सातवाहन यह महाराष्ट्र का पहला स्वकिय साम्राज्य था. इस राज्य का सही उत्कर्ष उनके कारदिर्दगी में ही शुरू हुआ. औरंगाबाद जिलें में स्थित पैठण शहर सातवाहनों की राजधानी थी. उसे सातवाहन काल में प्रतिष्ठाण कहा करते थे. इस के अलावा कलियान (कल्याण), सोपारा (नालासोपारा), नासिक (नाशिक), भोगवर्धन (भोकरदन), तगर (तेर), करहाटक (कऱ्हाड), नेवासा यह शहर सातवाहन काल में हरेभरे हो गये. सातवाहनों ने सह्याद्री के पर्वतों में कई किलों की निर्मिती की, घाट बनाये, बौद्ध भिक्खुं के लिये गुंफाये बनाई. 


उपर लिखित शहरो में उत्खनन के दौरान सातवाहनों का इतिहास सामने आया है. उन के कई राजाओं के सिक्के इस दौरान प्राप्त हुये. जुन्नर में स्थित नाणेघाट सातवाहन काल में बनाया गया था. प्राचीन घाट निर्मिती का तथा स्थापत्य अभियांत्रिकी का वह एक उत्तम नमूना माना जाता है. जुन्नर परिसर में हमें कई बौद्ध गुंफायें भी नज़र आती है. सातवाहन कालीन ऐसी गुंफायें पुणे जिले में भाजे, कार्ले, कण्हेरी, बेडसे यहां भी देखी जा सकती है. अजिंठा की गुंफायें भी सातवाहनों ने बनायी थी. महाराष्ट्र के कई किलों का अज्ञात इतिहास सातवाहन से जुड़ा हुआ है. नाणेघाट के पहारेदार माने जानेवाले जीवधन, चावंड तथा हडसर यह किलें सातवाहन काल में ही बनाये गये थे.
इस तरह महाराष्ट्र की संस्कृती पर सातवाहनों का बडा प्रभाव पडा है. लेकिन इस की जानकारी खुद मराठी लोगों को ही बहुत कम है, ऐसा मुझे समझ मे आया. अभी भी मै सातवाहनों का इतिहास खोज रहा हूं. मैने फेसबुक पर ’सातवाहनकालीन महाराष्ट्र’ नामक पेज भी बनाया है. इससे कई अभ्यासक जुडे हुए है. मुझे ऐसा लगता है की, इतिहास ही एक ऐसी चीज़ है जो हम नई समझ के सीखते है. मुझे यकीन है, की सातवाहनों का यह गौरवशाली इतिहास मै ज़रूर नये पाठकों के सामने लाने में कामयाब हुंगा.
जय महाराष्ट्र...!!!

Monday, May 27, 2013

बाप-बेटी की कहानी- एकुलती एक

सचिन पिळगांवकरजी के सिनेमा कारकिर्दगी का ५० वा साल संपन्न होने के वर्ष में उनकी नयी फ़िल्म ’एकुलती एक’ रीलीज़ हुई है. उनकी इकलौती सुकन्या श्रिया का फ़िल्म प्रदार्पन इस फ़िल्म से हुआ. फ़िल्म रिव्ह्यु के पुर्व मै यह बताना चाहुंगा की, उनका यह प्रदार्पन तथा प्रदर्शन नवोदित होने के पश्चात भी काफ़ी काबिले तारिफ़ रहा है. सचिन-सुप्रिया के वारिसदार के तौर पर श्रिया मराठी फ़िल्म जगत में काफ़ी आगे बढ सकती है.


’एकुलती एक’ का मतलब है- इकलौती संतान (लड़की). श्रिया का फ़िल्म में नाम स्वरा है जो बचपन में ही अपने पिता से अलग हो चुकी है और उसका पालन मां ने किया है. सचिनजी अरूण देशपांडे नामक प्रसिद्ध गायक के रूप में नज़र आते है, जो स्वरा के पिता है. फ़िल्म की पूरी कहानी इसी पिता-पुत्री के ’केमिस्ट्री’ पर आधारित है. बचपन में खोया हुआ पिता का प्यार पाने के लिए उन्हें समझने के लिये स्वरा उनके घर मुंबई आती है. दोनो के बीच लगाव-अलगाव के कई प्रसंग आते है, इन्हें सचिनजी ने परदे पर पेश किया है. फ़िल्म की कहानी तफसील में बताना यहा उचित नहीं होगा. सचिनजी ने खुद लिखी इस कहानी के कई अंग उन्होंने सही ढंग से निर्देशित किये है. उनका मराठी फ़िल्म जगत का इतने सालों का तरजुबा इस फ़िल्म में काफ़ी अच्छी तरह से नज़र आता है. लेकिन, यह फ़िल्म उनके अन्य फ़िल्मों की तरह विनोद के आधार पर नहीं बनी, यही विशेषता मानी जायेगी. मैने खुद उनकी ’आत्मविश्वास’ यह अंतिम फ़िल्म देखी थी जो पारिवारिक कहानी को लेकर बनायी गयी थी. उसके बाद ’एकुलती एक’ का नाम ले सकते है. फ़िल्म का हर एक केरेक्टर अपनी जगह बिल्कुल सही बिठाया गया है. हमेशा की तरह इसी फ़िल्म में भी अशोक सराफ़ का बड़ा रोल है. अरूण देशपांडे के सेक्रेटरी के रूप मे वे दिखाये गये है. सचिन-श्रिया के बाद मुख्य भुमिका उनकी ही रही है. उन्हें विनोदी ढंग से परदे पर देखा जा सकता है. उनके साथ साथ किशोरी शहाणे की भी भुमिका ’एकुलती एक’ में छाप दिखाती है.
सुबोध भावे, निर्मिती सावंत, विनय येडेकर तथा सुप्रिया पिळगांवकर भी इस फ़िल्म में अपना दर्शन देते है. सुप्रियाजी को स्वरा के मां के रूप में पेश किया गया है. सचिनजी एक महान कलाकार है ही लेकिन श्रिया का अभिनय प्रदर्शन देखने की मुझे बहुत इच्छा थी. मैं इससे काफ़ी खुश हूं. किसी भी दृश्य में वह कम नहीं दिखाई देती. बॉलिवूड फ़िल्म जगत में ऐसा देखा गया है की, स्टार्स के बच्चें अपने पहले कुछ फ़िल्मों में सामान्य ही अभिनय प्रदर्शन करते है. लेकिन यह मराठी लड़की अपने पहले ही फ़िल्म में बेहतरीन अदाकारी पेश कर चुकी है. भविष्य में मराठी जगत की अग्रणी अभिनेत्री बनने का सामर्थ्य इस लडकी में दिखता है. श्रिया के परफार्मेंन्स के लिये तो यह फ़िल्म देखना बनता है!
’एकुलती एक’ के संगीत के बारे में बताया जाये तो, जितेंद्र कुळकर्णी के ’नवरा माझा नवसाचा’ फ़िल्म की एक बार फिर से याद आ गयी. उसी ढंग का संगीत इस फ़िल्म में सुनाई दिया. सोनू निगम फिर से सुनने को मिलें. उसके लिये धन्यवाद देना चाहूंगा.
मराठी में एक अच्छी कहानी तथा श्रिया की अदाकारी को देखने के लिये यह फ़िल्म एक बार ज़रूर देखिये.

मेरी रेटिंग: ३.५ स्टार्स.

Friday, April 5, 2013

कंप्युटर मेमरी के परिमाण

किसी भी बात को नापने के लिये मात्रकों की अर्थात युनिट्स की ज़रूरत लगती है. कंप्युटर की मेमरी नापने के लिये भी किन्ही मात्रकों की तथा परिमाणों की ज़रूरत हैं. इन में से हम बहुत कम मात्रक जानते है. जैसे की मेगाबाईट, किलोबाईट तथा टेराबाईट आदि. असल में आजतक कंप्युटर की मेमरी इस से ज़्यादा नहीं बढ़ सकी है. किसी कंप्युटर इंजिनियर को भी इस के आगे वाले मात्रकों के बारे में जानकरी नहीं होगी! लेकिन कंप्युटर मेमरी की आज की रफ़्तार देखकर ऐसा लगता है की, आनेवाले कई सालों में हमे नये मात्रकों की जरूरत लग सकती हैं. रजनिकांत के ’इंदिरन’ अर्थात ’रोबोट’ नामक फ़िल्म में उसने अपना खुदका configuration बताने के लिये इसी मेमरी के किसी मात्रक का इस्तेमाल किया था. वह नीचे दियी गयी सूची में कौन सा है, इस का पता आप लगाईयेगा...!!!

१ बिट (० अथवा १) = बायनरी डिजिट

८ बिट्स = १ बाईट

१०२४ बाईट्स = १ केबी (किलोबाईट्स)

१०२४ केबी = १ एमबी (मेगाबाईट्स)

१०२४ एमबी = १ जीबी (गीगाबाईट्स)

१०२४ जीबी = १ टीबी (टेराबाईट्स)

१०२४ टीबी = १ पीबी (पेटाबाईट्स)

१०२४ पीबी = १ ईबी (एक्साबाईट्स)

१०२४ ईबी = १ झेडबी (झेटाबाईट्स)

१०२४ झेडबी = १ वायबी (योटाबाईट्स)

१०२४ वायबी = १ बीबी (ब्रॉंटोबाईट्स)

१०२४ बीबी = १ जीऑपबाईट्स

जीऑपबाईट्स यह कंप्युटर मेमरी नापने का सबसे बड़ा मात्रक है!

Sunday, March 24, 2013

जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा: रीव्ह्यु

महेश मांजरेकर निर्देशित फिल्म ’मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय’ यह मराठी की आजतक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म रही है. मराठी चित्रजगत में नयी क्रांती की शुरुआत इस फिल्म से हुई थी. इस फिल्म के यश स्वरूप मराठी मे कई फिल्में ’मराठी माणूस’ को सामने रखकर बनाई गयी. कुछ फिल्में चली और कुछ नहीं! ’जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा’ यह फिल्म भी इसी ’मराठी माणूस’ के विषय को लेकर बनाई गयी है.
Film Poster: Jay Maharashtra Dhaba Bhatinda
निर्देशक बने संगीतकार अवधूत गुप्ते की यह तीसरी मराठी फिल्म है. इस से पहले उनकी ’झेंडा’ तथा ’मोरया’ यह फ़िल्में बॉक्स आफिस पर अच्छा करिष्मा दिखा कर गयी थी. विशेषत: दोनो फ़िल्में कुछ न कुछ विवाद में रहने के बावजूद भी अच्छा कमाल दिखा गयी थी. पहले दो फ़िल्मों की तरह अवधूत गुप्ते निर्देशित ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ भी मराठी माटी से तालुक रखती है. इस फ़िल्म में अवधूत गुप्ते सिर्फ़ निर्देशक के रूप से सामने आये है. ऐसा कहा जाता है की, मराठी आदमी सिर्फ़ महाराष्ट्र मे ही अपना धंदा या कारोबार संभाल सकता है. महाराष्ट्र के बाहर वह कुछ भी नहीं कर सकता. इसी थीम को लेकर अवधूत ने  ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ की कहानी लिखी है. इस फ़िल्म में सिरियलों अभिनेता अभिजित खांडकेकर पहली बार रूपेरी परदे पर नज़र आये है. तथा अभिनेत्री प्रार्थना बेहेरे भी इसी फ़िल्म से अपना करियर शुरू कर चुकी है. मराठी में एक्शन हिरो की कमी इस फ़िल्म से फिर एक बार महसूस होती है. मराठी आदमी पंजाब के बठिंडा मे जाकर मराठी ढाबा खोलता है, इसी थीम पर यह फ़िल्म बनाने की कोशिश अवधूत ने की है. लेकिन वह एक प्रेमकहानी बन गयी है. ढाबे को बाजू में रखकर रोमँटिक फ़िल्म की ओर इस फ़िल्म की कहानी चल पडती है. फ़िल्म की शूटिंग पहली बार पंजाब में की गयी है, उसे कई बार पंजाबी टच नज़र आता है. कहानी को देखा जाये तो शायद उस पर ज़्यादा मेहनत लेने की ज़रूरत शायद अवधूत गुप्ते को थी. तभी एक अच्छी फ़िल्म वे बना सकते थे. निर्देशन उनका ठीक है, लेकिन कहानी समझने में ही दर्शक उलझते रहते है. यही इस फ़िल्म की ’कहानी’ है, ऐसा भी हम मान सकते है. अभिजित तथा प्रार्थना का यह ’डेब्यु’ ठीक ही रहा. दमदार एन्ट्री की अपेक्षा हम अभिजित खांडकेकर से कर रहे थे. लेकिन वे भी इस में सफल नहीं रहे.
Avadhoot Gupte
अवधूत ने पहली बार अपने फ़िल्म को संगीत नहीं दिया लेकिन निलेश मोहरीर ने इस फ़िल्म के संगीत में कोई भी कमी महसूस होने नहीं दी. फ़िल्म के गीत तथा संगीत ही सबसे मज़बूत बाजू है, ऐसा मैं कह सकता हूं. हर एक गीत मौसिकी के नज़रिए से बहुत ही श्रवनीय है. गूरू ठाकूर के गीत हमेशा की तरह याद रहते है. एक बार यह फ़िल्म देखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन शायद कथा सूत्र में उलझना पड सकता है.
मेरी रेटिंग: ३ स्टार, संगीत: ४.५ स्टार.

Friday, March 1, 2013

किलों का राजा: राजगड़

छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रहा किला राजगड के बारे में मुझे हमेशा उत्सुकता रही थी की यह किला कैसा होगा? तारिख़ के पन्नों में राजगड का वर्णन मैने सिर्फ़ पढा था. मगर देखने का सौभाग्य सन २०१२ में हासिल हुआ. दैनिक दिव्य मराठी को मैं इसलिये धन्यवाद देना चाहूंगा की उनकी वजह से मेरा यह सपना हुआ पूरा हुआ! दिव्य मराठी में मेरी लेख शृंखला किलों के विषय में शुरू होने वाली थी. इस के लिये उन्हों ने पहले ही रायगड़ तथा राजगड के विषय पर ही लेखों की मांग की. लेकिन मेरे पास दोनो लेख तैयार नहीं थें. इसलिये मैं और मेरा भाई दोनों पिछले साल दिसंबर में राजगड किलें की सैर करने निकल पड़े.



मैने यह तो सुना था की तोरणा किला तथा राजगड दोनों एक दूसरे के बहुत ही नज़दीक है. पिछले साल ही हमने तोरणा किले की भी सैर की थी मगर बारिश के मौसम में धुंद होने की वजह से तोरणा ही ठिक से देख नहीं पाए, राजगड तो दूर की बात थी. इस बार वातावरण साफ़ था. किले का वर्णन हमने इतिहास के किताबों में तो पढ़ा था तथा इंटरनेट से भी कुछ जानकारी हासिल की थी. किला एक दिन में देखना बहुत ही मुश्किल था. इसलिये सुबह साढेछह बजे ही पुणे से राजगड की ओर चल पडे. ठंड का मौसम होने की वजह से हवा में बहुत सर्द भरी हुई थी. पुणे के नज़दीक ही सिंहगड पहुंचते पहुंचते एक घंटा चला गया. तब तक सूरज काफ़ी उपर आ पहुंचा था. रविवार होने की वजह हे हमेशा की तरह सिंहगड पर युवतीयों की काफ़ी भीड़ थी. वे रविवार को यहां क्या करने आती है, इसका इल्म अब सारे पुणे को हो चुका है! सिंहगड से दाई तरफ़ जानेवाले रास्तें पर राजगड करीब तीस किलोमीटर की दूरी पर है. लेकिन यह रास्ता पहाडों के बीच से गुजरता है तथा कई घाट इस रास्ते में है. इसी कारणवश यहां से राजगड पहुंचने के लिये एक घंटा तो लगता ही है. जिस पहाड़ को पार करते वक्त सिंहगड. दृष्टी से दूर जाता है, वही राजगड तथा तोरणा किला नज़र आता है! राजगड और तोरणा की यह जोडी दूर से अद्भूत नज़र आती है. वैसे तोरणा किला वेल्हे, जो तहसील का स्थान है उस के करीब ही है. लेकिन राजगड के नज़दीक कोई बड़ा गांव नहीं है. अगर किसी सरकारी बस से आना हो तो कई दूर तक पैदल चलना पड़ता है. वेल्हे तहसील में इसी रास्ते पर ’पाबे’ नामक गांव से दो रास्ते निकलते हैं. बांया राजगड की ओर और दांया रास्ता तोरणा की तरफ़ जाता है. इस जगह से करीब दस बारह किलोमीटर की दूरी पर राजगड किला है. रास्ते पर चलते चलते राजगड का अनोखा दर्शन हम ले सकते है. इस रास्ते पर आखरी गांव है, भोंसलेवाडी. इस रास्ते से राजगड का तल दोन-तीन कि.मी. की दूरी पर है. चलते चलते राजगड की अद्भूत उंचाई नापते नापते ही हम चलते है. मराठों का गौरवशाली इतिहास आंखों के सामने ख़ड़ा होता है. छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी कैसी होनी चाहिये, इस का उत्तर हमें और खोजने की कतई जरूरत नहीं होती.

किले के तल से शिखर तक का सफ़र पार करने के लिये करीब डेढ़ घंटे का समय तो लग ही जाता है. इस रास्ते पर आधा सफ़र पार करने पर पत्थरों की सीढीयां नज़र आती है. एक एक पैड़ी एक आदमी जितनी लंबी है. यह पत्थर इतने उपर कैसे लाए गए होंगे, इस का हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. किले के शिखर पर पहुंचने से पहले मुख्य दरवाज़ा दिखाई देता है. आज भी यह दरवाज़ा काफ़ी मज़बूत स्थिती मे है. राजगड किले के चार प्रमुख भाग है- मुख्य किला (जिसे बालेकिला कहते है), संजीवनी माची, सुवेळा माची तथा पद्मावती माची. राजगड का सबसे उंचा भाग बालेकिला ही है. पुराने जमाने में यही मुख्य किला था. उसे मुंरूंबदेव का पहाड़ कहा करते थे. लेकिन शिवाजी महाराज ने इस पर्वत पर विजय हासिल करने के पश्चात सुवेळा, संजीवनी तथा पद्मावती माची का निर्माण किया और यह किला बहुत बड़ा दिखने लगा. किले की दाई ओर संजीवनी माची है. यह भाग करीब दो-ढाई किलोमीटर का है. आज भी वह सुस्थिती मे दिखाई देता है. यहा से भाटघर बांध तथा तोरणा किला साफ़ दिखाई देता है. तोरणा की तरफ़ जानेवाला रास्ता यही से निकलता है. बालेकिला के पिछली बाजू में सुवेळा माची है. इस माची पर हम कई स्थल देख सकते है. हस्तीप्रस्तर तथा यहा से आने के लिए और एक कठिन दरवाज़ा इसी माची पर है. यह दो किलोमीटर की माची है. माची के अंतिम शिखर से पुरंदर तथा वज्रगड दिखाई देते है. सुवेळा माची से पद्मावती माची की ओर जाने के लिए बालेकिला के दाई तरफ़ से जाना पड़ता है. इसी रास्ते पर नीचे की तरफ़ जाने के लिए एक और द्वार है जिसे ’गुंजवणे दरवाजा’ कहते है. यह गुंजवणे गांव से उपर आता है.

छोटी होने के बावजूद पद्मावती माची पर देखने लायक कई जगह है. सदर, पद्मावती मंदिर, पेयजल के ठिकान, चोर दरवाज़ा, पद्मावती तलाव इस माची पर स्थित है. यही सामने की तरफ़ सिंहगड किला दिखाई देता है. यहा से बालेकिला की ओर जाने के लिए पिछे जाना पड़ता है. रास्ते पर बड़ा ध्वजस्तंभ लगाया हुआ है. बालेकिला की ओर जानेवाला रास्ता झाडियों से निकलता है. यह रास्ता राजगड का सबसे कठिन रास्ता होगा. आज यहा पर दोनो तरफ़ रेलिंग लगाई हुई है, इसलिए यहा की चढा़ई सुलभ हो चुकी है. कभी कभी कल्पना करता हूं की, शिवकाल में यहा से लोग कैसे आते जाते रहे होंगे? यह रास्ता पार करने पश्चात हम बालेकिला के मुख्य दरवाज़े पर पहुंचते है. यही से सामने सुवेळा माची नज़र आती है. बालेकिला का परिसर इतना विस्तीर्ण तो नही है. यहा कई जगह महलों के अवशेष नज़र आते है. दाई तरफ़ ब्रम्हर्षी ऋषी का एक छोटा मंदिर भी दिखाई देता है. बालेकिला इस जगह का सबसे उंचा स्थान होने की वजह से यहां से पूरा मावळ इलाका एक ही दृष्टी में सहज समा जाता है. आजुबाजु के सभी किलें यहां से नज़र आते है. शिवचरित्र का पुनर्संशोधन करने का मन करता है. यही से मराठा साम्राज्य की यह पहली राजधानी कितनी मनमोहक रही होंगी, इसका अंदाज़ा आ सकता है.

शिवाजी महाराज का सबसे अधिक वास्तव इसी किले पर था. इसलिए शिवप्रेमीओं के लिए यह किला एक तीर्थक्षेत्र की तरह है. अगर शिवाजी महाराज को जानना है तो इस किलें को एक बार ज़रूर भेंट देना मत भूलिए...

जय शिवाजी, जय भवानी...!!

Saturday, December 1, 2012

छत्रपति (शीर्षक गीत)



सन २००५ में तेलुगू में ’छत्रपति’ नामक फ़िल्म रीलीज़ हुई थी। राजामौली निर्देशित इस फ़िल्म में प्रभास, भानुप्रिया तथा श्रिया सरन की मुख्य भुमिकाएं थी। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत और थीम संगीत बहुत ही सुमधुर है। फ़िल्म की रीलीज़ के बाद वह काफ़ी मशहूर हुआ था। ये संस्कृत गीत यहां शब्दों में लिखकर दे रहा हूं। इस लिंकपर यह गीत सुना जा सकता है।


अग्नी स्खलन संत्रधरिपु वर्ग प्रलय रथ छत्रपति..
मध्यमधिन सम्युध्यात किरण विद्यधुमति खनि छत्रपति..
तज्जेम तज्जेनु तधिम धिरन..
धिम धिम तटिक नट छत्रपति..
ऊर्वी प्रलय संभाव्यवर स्वच्छंद गुणधि.....

कुंभी निकर कुंभस्य गुरू कुंभि वलय पति छत्रपति..
झंझा पवन गर्वापहर विंद्याद्रीसम द्रुति छत्रपति..
चंडा प्रबल दोर्दंडजित दुर्दंड भट तति छत्रपति..
शत्रू प्रकर विच्छेदकर भीमार्जुन प्रति..... ॥ २ ॥

धिग धिग विजय डंका निनद घंटारव तुष्ठित छत्रपति..
संघ स्वजन विद्रोही गण विध्वंसव्रत मति छत्रपति..
आर्थात्राण दुष्टद्युम्न क्षात्र स्फुर्ति दिधति..
भीमक्षामपति, शिक्षा, स्मृति स्थापति.....

फ़िल्म: छत्रपति (तेलुगू, मल्याळम-डब), हुकुमत की जंग (हिंदी-डब)
संगीत: किरावनी
समूह गायक: किरावनी, मंजिरी, मतांगी.

इस गीत के गीतकार कौन है? इस की जानकारी मुझे नहीं मिली। अगर किसी को इस के बारे में जानकारी है तो कृपया कमेंट करें।

Saturday, September 1, 2012

काकस्पर्श: अब बॉलिवूड में



महेश मांजरेकर एक बहुत ही संवेदनशील निर्देशक है, ऐसा मुझे उनकी फ़िल्म ’काकस्पर्श देखकर लगा. सन २०१२ में प्रदर्शित हुई ’काकस्पर्श’ महेश मांजरेजर की सर्वोत्तम फ़िल्म मैं मानता हूं. मैंने उनकी सभी मराठी फ़िल्में देखी हैं, लेकिन इस फ़िल्म का अंदाज़ ही कुछ अलग नज़र आया. ’काकस्पर्श’ जैसी फ़िल्म बनाने में महेशजी ने कितना अभ्यास किया होगा, यह फ़िल्म देखने पर ही पता चलता है.

’काकस्पर्श’ मतलब ’कौए का स्पर्श’. मनुष्य के मृत्युपश्चात करने का यह एक विधी है. हिंदू परंपराओं के अनुसार वह किया जाता है. जब तक ’काकस्पर्श’ नहीं होता तब तक मनुष्य के आत्मा को शांती नहीं मिलती. इसी कहानी को निर्देशक ने परदे पर फ़िल्म में दिखाया है. मूलत: कहानी एक विधवा के जीवन पर आधारित है. जिस का रोल केतकी माटेगांवकर तथा प्रिया बापट ने किया है. दोनों अभिनेत्रियों के जीवन का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ रोल रहा होगा. फ़िल्म में असली जान हरिदादा की भूमिका करनेवाले सचिन खेडेकर ने लाई है. मैं इस फ़िल्म की कहानी यहां बयां तो नहीं करूंगा, तथा समीक्षा का भी मेरा कोई इरादा नहीं है. अगर ’काकस्पर्श’ देखनी है और आप संवेदनशील फ़िल्मों में रूची रखते है तो यह फ़िल्म ज़रूर देखिये. मुझ से अच्छी समीक्षा सतिश पंचम ने अपने ब्लॉग ’सफ़ेद घर’ में की है. इसे ज़रूर पढ़िये.
सुनने में आया है की, अब यह फ़िल्म बॉलिवूड में बनने वाली है. और इस में मुख्य भुमिका महानायक अमिताभ बच्चन निभाने वाले है. अन्य भारतीय भाषाओं की फ़िल्में अब बॉलिवूड वाले फिरसे बनाने लगी है. इस चोरी को वह ’रीमेक’ कहा करते है. इसी बलबूते पर अब बॉलिवूड चलने लगा है. फ़िल्म के रीमेक की पुष्टी तो हुई है, लेकिन मुख्य भुमिका की अब तक नहीं हुई. सचिन खेडेकर जैसे सशक्त अभिनेता का रोल करने वाला कोई वैसाही अभिनेता होना चाहिये.
फ़िल्म बॉलिवूड में बनेगी तो शायद इसे कम प्रतिसाद मिले. क्युंकि आजकल बॉलिवूड में सिर्फ़ मसालेदार फ़िल्में ही चलती है. अन्य फ़िल्में तो सिर्फ़ एवार्ड्स के लिये ही बनायी जाती है, ऐसा कहा जाता है. उम्मीद करते है की, उषा दातार की उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म बॉलिवूड में बने और अधिकतम लोग इसे देखें.
शुभकामनायें...