Sunday, March 24, 2013

जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा: रीव्ह्यु

महेश मांजरेकर निर्देशित फिल्म ’मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय’ यह मराठी की आजतक की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म रही है. मराठी चित्रजगत में नयी क्रांती की शुरुआत इस फिल्म से हुई थी. इस फिल्म के यश स्वरूप मराठी मे कई फिल्में ’मराठी माणूस’ को सामने रखकर बनाई गयी. कुछ फिल्में चली और कुछ नहीं! ’जय महाराष्ट्र ढाबा बठिंडा’ यह फिल्म भी इसी ’मराठी माणूस’ के विषय को लेकर बनाई गयी है.
Film Poster: Jay Maharashtra Dhaba Bhatinda
निर्देशक बने संगीतकार अवधूत गुप्ते की यह तीसरी मराठी फिल्म है. इस से पहले उनकी ’झेंडा’ तथा ’मोरया’ यह फ़िल्में बॉक्स आफिस पर अच्छा करिष्मा दिखा कर गयी थी. विशेषत: दोनो फ़िल्में कुछ न कुछ विवाद में रहने के बावजूद भी अच्छा कमाल दिखा गयी थी. पहले दो फ़िल्मों की तरह अवधूत गुप्ते निर्देशित ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ भी मराठी माटी से तालुक रखती है. इस फ़िल्म में अवधूत गुप्ते सिर्फ़ निर्देशक के रूप से सामने आये है. ऐसा कहा जाता है की, मराठी आदमी सिर्फ़ महाराष्ट्र मे ही अपना धंदा या कारोबार संभाल सकता है. महाराष्ट्र के बाहर वह कुछ भी नहीं कर सकता. इसी थीम को लेकर अवधूत ने  ’जय महाराष्ट्र ढावा बठिंडा’ की कहानी लिखी है. इस फ़िल्म में सिरियलों अभिनेता अभिजित खांडकेकर पहली बार रूपेरी परदे पर नज़र आये है. तथा अभिनेत्री प्रार्थना बेहेरे भी इसी फ़िल्म से अपना करियर शुरू कर चुकी है. मराठी में एक्शन हिरो की कमी इस फ़िल्म से फिर एक बार महसूस होती है. मराठी आदमी पंजाब के बठिंडा मे जाकर मराठी ढाबा खोलता है, इसी थीम पर यह फ़िल्म बनाने की कोशिश अवधूत ने की है. लेकिन वह एक प्रेमकहानी बन गयी है. ढाबे को बाजू में रखकर रोमँटिक फ़िल्म की ओर इस फ़िल्म की कहानी चल पडती है. फ़िल्म की शूटिंग पहली बार पंजाब में की गयी है, उसे कई बार पंजाबी टच नज़र आता है. कहानी को देखा जाये तो शायद उस पर ज़्यादा मेहनत लेने की ज़रूरत शायद अवधूत गुप्ते को थी. तभी एक अच्छी फ़िल्म वे बना सकते थे. निर्देशन उनका ठीक है, लेकिन कहानी समझने में ही दर्शक उलझते रहते है. यही इस फ़िल्म की ’कहानी’ है, ऐसा भी हम मान सकते है. अभिजित तथा प्रार्थना का यह ’डेब्यु’ ठीक ही रहा. दमदार एन्ट्री की अपेक्षा हम अभिजित खांडकेकर से कर रहे थे. लेकिन वे भी इस में सफल नहीं रहे.
Avadhoot Gupte
अवधूत ने पहली बार अपने फ़िल्म को संगीत नहीं दिया लेकिन निलेश मोहरीर ने इस फ़िल्म के संगीत में कोई भी कमी महसूस होने नहीं दी. फ़िल्म के गीत तथा संगीत ही सबसे मज़बूत बाजू है, ऐसा मैं कह सकता हूं. हर एक गीत मौसिकी के नज़रिए से बहुत ही श्रवनीय है. गूरू ठाकूर के गीत हमेशा की तरह याद रहते है. एक बार यह फ़िल्म देखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन शायद कथा सूत्र में उलझना पड सकता है.
मेरी रेटिंग: ३ स्टार, संगीत: ४.५ स्टार.

Friday, March 1, 2013

किलों का राजा: राजगड़

छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रहा किला राजगड के बारे में मुझे हमेशा उत्सुकता रही थी की यह किला कैसा होगा? तारिख़ के पन्नों में राजगड का वर्णन मैने सिर्फ़ पढा था. मगर देखने का सौभाग्य सन २०१२ में हासिल हुआ. दैनिक दिव्य मराठी को मैं इसलिये धन्यवाद देना चाहूंगा की उनकी वजह से मेरा यह सपना हुआ पूरा हुआ! दिव्य मराठी में मेरी लेख शृंखला किलों के विषय में शुरू होने वाली थी. इस के लिये उन्हों ने पहले ही रायगड़ तथा राजगड के विषय पर ही लेखों की मांग की. लेकिन मेरे पास दोनो लेख तैयार नहीं थें. इसलिये मैं और मेरा भाई दोनों पिछले साल दिसंबर में राजगड किलें की सैर करने निकल पड़े.



मैने यह तो सुना था की तोरणा किला तथा राजगड दोनों एक दूसरे के बहुत ही नज़दीक है. पिछले साल ही हमने तोरणा किले की भी सैर की थी मगर बारिश के मौसम में धुंद होने की वजह से तोरणा ही ठिक से देख नहीं पाए, राजगड तो दूर की बात थी. इस बार वातावरण साफ़ था. किले का वर्णन हमने इतिहास के किताबों में तो पढ़ा था तथा इंटरनेट से भी कुछ जानकारी हासिल की थी. किला एक दिन में देखना बहुत ही मुश्किल था. इसलिये सुबह साढेछह बजे ही पुणे से राजगड की ओर चल पडे. ठंड का मौसम होने की वजह से हवा में बहुत सर्द भरी हुई थी. पुणे के नज़दीक ही सिंहगड पहुंचते पहुंचते एक घंटा चला गया. तब तक सूरज काफ़ी उपर आ पहुंचा था. रविवार होने की वजह हे हमेशा की तरह सिंहगड पर युवतीयों की काफ़ी भीड़ थी. वे रविवार को यहां क्या करने आती है, इसका इल्म अब सारे पुणे को हो चुका है! सिंहगड से दाई तरफ़ जानेवाले रास्तें पर राजगड करीब तीस किलोमीटर की दूरी पर है. लेकिन यह रास्ता पहाडों के बीच से गुजरता है तथा कई घाट इस रास्ते में है. इसी कारणवश यहां से राजगड पहुंचने के लिये एक घंटा तो लगता ही है. जिस पहाड़ को पार करते वक्त सिंहगड. दृष्टी से दूर जाता है, वही राजगड तथा तोरणा किला नज़र आता है! राजगड और तोरणा की यह जोडी दूर से अद्भूत नज़र आती है. वैसे तोरणा किला वेल्हे, जो तहसील का स्थान है उस के करीब ही है. लेकिन राजगड के नज़दीक कोई बड़ा गांव नहीं है. अगर किसी सरकारी बस से आना हो तो कई दूर तक पैदल चलना पड़ता है. वेल्हे तहसील में इसी रास्ते पर ’पाबे’ नामक गांव से दो रास्ते निकलते हैं. बांया राजगड की ओर और दांया रास्ता तोरणा की तरफ़ जाता है. इस जगह से करीब दस बारह किलोमीटर की दूरी पर राजगड किला है. रास्ते पर चलते चलते राजगड का अनोखा दर्शन हम ले सकते है. इस रास्ते पर आखरी गांव है, भोंसलेवाडी. इस रास्ते से राजगड का तल दोन-तीन कि.मी. की दूरी पर है. चलते चलते राजगड की अद्भूत उंचाई नापते नापते ही हम चलते है. मराठों का गौरवशाली इतिहास आंखों के सामने ख़ड़ा होता है. छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी कैसी होनी चाहिये, इस का उत्तर हमें और खोजने की कतई जरूरत नहीं होती.

किले के तल से शिखर तक का सफ़र पार करने के लिये करीब डेढ़ घंटे का समय तो लग ही जाता है. इस रास्ते पर आधा सफ़र पार करने पर पत्थरों की सीढीयां नज़र आती है. एक एक पैड़ी एक आदमी जितनी लंबी है. यह पत्थर इतने उपर कैसे लाए गए होंगे, इस का हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. किले के शिखर पर पहुंचने से पहले मुख्य दरवाज़ा दिखाई देता है. आज भी यह दरवाज़ा काफ़ी मज़बूत स्थिती मे है. राजगड किले के चार प्रमुख भाग है- मुख्य किला (जिसे बालेकिला कहते है), संजीवनी माची, सुवेळा माची तथा पद्मावती माची. राजगड का सबसे उंचा भाग बालेकिला ही है. पुराने जमाने में यही मुख्य किला था. उसे मुंरूंबदेव का पहाड़ कहा करते थे. लेकिन शिवाजी महाराज ने इस पर्वत पर विजय हासिल करने के पश्चात सुवेळा, संजीवनी तथा पद्मावती माची का निर्माण किया और यह किला बहुत बड़ा दिखने लगा. किले की दाई ओर संजीवनी माची है. यह भाग करीब दो-ढाई किलोमीटर का है. आज भी वह सुस्थिती मे दिखाई देता है. यहा से भाटघर बांध तथा तोरणा किला साफ़ दिखाई देता है. तोरणा की तरफ़ जानेवाला रास्ता यही से निकलता है. बालेकिला के पिछली बाजू में सुवेळा माची है. इस माची पर हम कई स्थल देख सकते है. हस्तीप्रस्तर तथा यहा से आने के लिए और एक कठिन दरवाज़ा इसी माची पर है. यह दो किलोमीटर की माची है. माची के अंतिम शिखर से पुरंदर तथा वज्रगड दिखाई देते है. सुवेळा माची से पद्मावती माची की ओर जाने के लिए बालेकिला के दाई तरफ़ से जाना पड़ता है. इसी रास्ते पर नीचे की तरफ़ जाने के लिए एक और द्वार है जिसे ’गुंजवणे दरवाजा’ कहते है. यह गुंजवणे गांव से उपर आता है.

छोटी होने के बावजूद पद्मावती माची पर देखने लायक कई जगह है. सदर, पद्मावती मंदिर, पेयजल के ठिकान, चोर दरवाज़ा, पद्मावती तलाव इस माची पर स्थित है. यही सामने की तरफ़ सिंहगड किला दिखाई देता है. यहा से बालेकिला की ओर जाने के लिए पिछे जाना पड़ता है. रास्ते पर बड़ा ध्वजस्तंभ लगाया हुआ है. बालेकिला की ओर जानेवाला रास्ता झाडियों से निकलता है. यह रास्ता राजगड का सबसे कठिन रास्ता होगा. आज यहा पर दोनो तरफ़ रेलिंग लगाई हुई है, इसलिए यहा की चढा़ई सुलभ हो चुकी है. कभी कभी कल्पना करता हूं की, शिवकाल में यहा से लोग कैसे आते जाते रहे होंगे? यह रास्ता पार करने पश्चात हम बालेकिला के मुख्य दरवाज़े पर पहुंचते है. यही से सामने सुवेळा माची नज़र आती है. बालेकिला का परिसर इतना विस्तीर्ण तो नही है. यहा कई जगह महलों के अवशेष नज़र आते है. दाई तरफ़ ब्रम्हर्षी ऋषी का एक छोटा मंदिर भी दिखाई देता है. बालेकिला इस जगह का सबसे उंचा स्थान होने की वजह से यहां से पूरा मावळ इलाका एक ही दृष्टी में सहज समा जाता है. आजुबाजु के सभी किलें यहां से नज़र आते है. शिवचरित्र का पुनर्संशोधन करने का मन करता है. यही से मराठा साम्राज्य की यह पहली राजधानी कितनी मनमोहक रही होंगी, इसका अंदाज़ा आ सकता है.

शिवाजी महाराज का सबसे अधिक वास्तव इसी किले पर था. इसलिए शिवप्रेमीओं के लिए यह किला एक तीर्थक्षेत्र की तरह है. अगर शिवाजी महाराज को जानना है तो इस किलें को एक बार ज़रूर भेंट देना मत भूलिए...

जय शिवाजी, जय भवानी...!!